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हाईकोर्ट की सख्ती के बाद बेनकाब हुई MP पुलिस की लापरवाही

नाबालिग अपहरण मामले में CM मोहन यादव सरकार पर भी उठे सवाल


इंदौर में नाबालिग किशोरी के अपहरण मामले ने मध्य प्रदेश की कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 23 फरवरी को हुई घटना के बाद परिजनों द्वारा बार-बार शिकायत करने के बावजूद पुलिस ने न केवल FIR दर्ज करने में आनाकानी की, बल्कि आरोपितों के नाम तक शामिल करने से बचती रही। यह रवैया न सिर्फ पुलिस की लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि न्याय प्रक्रिया के साथ खुला खिलवाड़ भी है। मजबूर होकर जब एक मजदूर पिता को हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी, तब जाकर मामला गंभीरता से लिया गया।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस पूरे प्रकरण में छुट्टी के दिन सुनवाई कर यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायपालिका अब ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेगी। कोर्ट की डबल बेंच ने पुलिस को जमकर फटकार लगाते हुए न केवल जांच में लापरवाही पर नाराजगी जताई, बल्कि सख्त आदेश देते हुए कहा कि नाबालिग बालिका और सभी आरोपितों को हर हाल में 6 अप्रैल को कोर्ट के समक्ष पेश किया जाए। यह कदम दर्शाता है कि जब प्रशासन अपने कर्तव्यों में लापरवाही करता है, तब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है।

इस मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि पुलिस ने शुरुआती दौर में परिजनों द्वारा बताए गए आरोपितों के नाम को नजरअंदाज किया और मामले को कमजोर करने की कोशिश की। डेढ़ महीने तक कोई ठोस कार्रवाई न होना, पीड़ित परिवार से संपर्क तक न करना, यह साबित करता है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कितना उदासीन रहा। यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो संभवतः स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती।

मध्य प्रदेश सरकार की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में सवालों के घेरे में है। प्रदेश में कानून-व्यवस्था को लेकर किए जाने वाले दावों के बीच इस तरह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि जमीनी स्तर पर हालात कितने कमजोर हैं। जब एक अनुसूचित जाति की नाबालिग बच्ची के अपहरण जैसे गंभीर मामले में भी पुलिस सक्रिय नहीं होती, तो यह मध्य प्रदेश सरकार की कानून व्यवस्था की कमजोरी का स्पष्ट संकेत है।

हाईकोर्ट के सख्त रुख के बाद अचानक पुलिस का सक्रिय होना भी कई सवाल खड़े करता है। जो पुलिस पहले शिकायत तक सुनने को तैयार नहीं थी, वही अब कोर्ट के आदेश के बाद तुरंत पीड़िता के घर पहुंचकर जानकारी जुटाने में लगी है। यह बदलाव इस बात का सबूत है कि बिना न्यायिक दबाव के पुलिस अपनी जिम्मेदारी निभाने में दिलचस्बी नहीं दिखती है

यह पूरा मामला न केवल एक परिवार के संघर्ष की कहानी है, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करने वाला उदाहरण भी है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को न्याय के लिए दर-दर न भटकना पड़े। यह तो सिर्फ एक मामला है जो हाई कोर्ट के सामने पहुंच गया तो इसमें पीड़ित को न्याय भी मिल गया मध्य प्रदेश में ऐसे हजारों मामले रोज ही मजबूर पीड़ितों के सामने आते हैं जहां पुलिस सुना तो दूर उल्टा उनको ही फटकार लगाकर खाने से लौटा देती जब पीड़ित थाने शिकायत करने पहुंचते हैं तो उनके साथ पुलिस का ऐसा व्यवहार होता है जैसे मानो न्याय मांगना इन दोनों पुलिस के सामने सबसे बड़ा गुनाह हो गया हो कई बार पुलिस के खराब रवि के कारण पीड़ित न्याय की उम्मीद छोड़कर सब भगवान भरोसे छोड़ देते हैं जिसका फायदा सीधा तौर पर पुलिस को पहुंचता है क्योंकि पुलिस के पास अपराधी का नाम पहुंच जाता है और पीड़ित को थाने से लौट कर फिर पुलिस इस मामले को गंभीर दिखाकर अपराधी से मिल लेती है। ऐसा प्रतीत होता है